गर्भाशय ट्यूमर कितनी तेजी से बढ़ सकता है?HealthPlanet

Posted on Sat 4th Feb 2023 : 12:13

बच्चेदानी में गांठ का ऑपरेशन (हिस्टेरेक्टॉमी सर्जरी) हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय हटाने की सर्जरी) असामान्य और अत्यधिक रक्तस्राव, असामान्य पेट में ऐंठन, गर्भाशय में फाइब्रॉएड या एंडोमेट्रियोसिस से पीड़ित महिलाओं के लिए सबसे सही ट्रीटमेंट है।

-फाइब्रॉएड औरतों में पाई जाने वाली सबसे आम प्रॉब्लम है.
-फाइब्रॉएड यानी रसौलियां.
-रसौलियां मांस के छोटे-छोटे गोले होते हैं.
-जो बच्चेदानी में पाए जाते हैं.
-आमतौर पर इनसे कैंसर नहीं होता.
-इसलिए घबराने की बात नहीं है.
-लगभग 80 प्रतिशत महिलाओं में फाइब्रॉएड होते हैं.
-जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, 40 पार होती है तब तक 80 प्रतिशत महिलाओं को फाइब्रॉएड हो जाते हैं.
-लेकिन ज़रूरी नहीं है कि हर महिला में इसके लक्षण दिखें.
-केवल 20-30 प्रतिशत महिलाओं में इसके लक्षण दिखते हैं.

लक्षण

-आमतौर पर फाइब्रॉएड 3 तरह के होते हैं.
-अगर गर्भाशय में रसौलियों का मुंह अंदर की तरफ़ होता है तो उसे सबम्यूकोसल फाइब्रॉएड कहते हैं.
-इस तरह के फाइब्रॉएड में आमतौर पर ब्लीडिंग बढ़ जाती है.
-खून का रिसाव महीने के टाइम पर ज़्यादा होता है.
-बाकी दो रसौलियां या तो बच्चेदानी की मांसपेशियों की परत में मिलती हैं जिसको इंट्राम्यूरल फाइब्रॉएड कहते हैं.

-या ये रसौलियां ऊपर और बाहर की तरफ़ होती है जिसे सबसेरोसल फाइब्रॉएड कहते हैं.
-तीनों टाइप के फाइब्रॉएड के अलग-अलग लक्षण होते हैं.
-अगर फाइब्रॉएड अंदर की तरह है तो ब्लीडिंग ज़्यादा होती है.
-बाकी दोनों फाइब्रॉएड का ब्लीडिंग पर कुछ ख़ास असर नहीं पड़ता है.
-लेकिन अगर इनका साइज़ ज़्यादा बढ़ जाए तो पेशाब की थैली पर प्रेशर पड़ता है.
-जिसके कारण बार-बार पेशाब आता है.
-अगर रसौलियों के कारण प्रेशर आंतों पर पड़ता है तो पेट में भारीपन और सूजन महसूस होती है.

डायग्नोसिस

-लक्षण महसूस होने पर स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलें.
-उसके बाद एक अल्ट्रासाउंड होगा.
-जिससे पता चलेगा कि ये रसौलियां शरीर में हैं या नहीं.

हेल्थ रिस्क

-आमतौर पर इन रसोलियों का कैंसर से लेना-देना नहीं होता.
-केवल 0.1 प्रतिशत रसौलियां आगे जाकर कैंसर में बदल सकती हैं.
-पर ज़्यादातर इनमें कैंसर का रिस्क नहीं होता.
-लेकिन अगर इनके कारण ब्लीडिंग ज़्यादा होती है तो अनीमिया हो सकता है.
-ऐसे में बेहतर यही रहता है कि इनका इलाज करवाकर हटा दिया जाए.

इलाज

-लोगों को समझ में नहीं आता कि दवाइयों से इलाज करवाएं या सर्जरी करवाएं.
-अगर किसी भी कारण से उस समय सर्जरी नहीं करवा सकते तो दवाइयां दी जाती हैं.
-ताकि इलाज का समय बढ़ सके.
-ये फाइब्रॉएड हॉर्मोन्स पर निर्भर करते हैं.
-ये हॉर्मोन हैं एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टेरॉन.
-ये दोनों हॉर्मोन फाइब्रॉएड का साइज़ बढ़ाते हैं.
-जब मेनोपॉज़ का समय आता है तब ये फाइब्रॉएड अपने आप सिकुड़ जाते हैं.
-अगर मेनोपॉज़ के आसपास हैं तब दवाइयों की मदद से कुछ समय काटा जा सकता है, जब तक मेनोपॉज़ नहीं हो जाता.
-लेकिन अगर आपकी उम्र 40 साल के आसपास है और फाइब्रॉएड ज़्यादा परेशान करते हैं तो सर्जरी इसका उपाय है.
-इसमें दो तरह से सर्जरी की जा सकती है.


बचाव

-बचाव के बहुत सारे तरीके नहीं हैं, पर हेल्दी डाइट लें.
-अनीमिया से बचें.
-एक्सरसाइज करें.
-हेल्दी शरीर में फाइब्रॉएड के कम लक्षण दिखते हैं.
किन महिलाओं में ये ज़्यादा आम है?
-आमतौर पर फाइब्रॉएड का कोई पुख्ता कारण मिला नहीं है.
-लेकिन जो लोग ओवरवेट होते हैं, जिन लोगों ने बच्चे पैदा नहीं किए या अफ्रीकन रेस की महिलाओं में ये ज़्यादा आम है.
-साथ ही ये जेनेटिक भी हैं, जैसे अगर मां को है तो बेटी को भी हो सकते हैं.
-पीरियड्स जल्दी आ गए हैं
-ये वजहें हो सकती हैं, पर अभी तक कोई ख़ास प्रमाण नहीं मिला है.
आपने डॉक्टर योगिता की बातें सुनीं. अगर आपको फाइब्रॉएड की दिक्कत है तो डरने की ज़रूरत नहीं है. ये बहुत आम है. फाइब्रॉएड का मतलब ये हरगिज़ नहीं कि आपको कैंसर है. कई लोगों में तो इसके लक्षण दिखते भी नहीं. अगर आपको ज़्यादा लक्षण महसूस हो रहे हैं, इनसे दिक्कत हो रही है तो डॉक्टर से ज़रूर मिलें. दवाइयों और सर्जरी की मदद से इसे ठीक किया जा सकता है.

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